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पिता की वह अदृश्य जेब

✍️ लेखन: हेमंत कुमार मेघवाल

पिता की वह अदृश्य जेब

 

मुझे याद आता है पिता का वह गुस्सा

और उस गुस्से के पीछे छिपा

एक अनकहा-सा, अदृश्य प्रेम भी 

 

याद आती है पिता की वह जादुई जे

जो हमारे लिए तो कभी खाली नहीं होती,

क्योंकि पिता हमारे लिए बन जाते है ठीक उस

मीठे पानी वाली नदी की तरह जो सभी की

प्यास बुझा देती है

पर इसी के विपरीत, वह जेब उनके लिए

अक्सर लगभग खाली ही रहती थी

क्योंकि पापा स्वयं के लिए बन जाते

उस खारे समुद्र के पानी की तरह

जो स्वयं अथाह होकर

अपनी प्यास नहीं बुझाता

 

मैं आज तक न समझ पाया

पिता की उस जेब का रहस्य

कैसे वह हमारी हर चाह पूरी कर देती थी

पर खुद पिता की ज़रूरतों को

किसी कोने में चुपचाप छुपा लेती थी ।

 

स्रोत : नवपल्लव के लिए हेमंत कुमार मेघवाल द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता। 


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